दीपक से अगरबत्ती जलाने पर आती है दरिद्रता, पितृदोष का भी खतरा: पूजा के नियम जानिए

Kalamveer News Network
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शास्त्रों के अनुसार गणेश को तुलसी और शिव को केतकी नहीं चढ़ती, रविवार को दूर्वा तोड़ना भी है वर्जित, छोटी गलतियां बन सकती हैं बड़े दोष का कारण

कलमवीर, वाराणसी। पूजा-पाठ के दौरान अक्सर हम कई छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यही गलतियां पूजा का फल कम कर देती हैं। शास्त्रों में पूजा से जुड़े कई ऐसे नियम बताए गए हैं जिनका पालन करना बेहद जरूरी माना जाता है। दीपक से अगरबत्ती जलाने को दरिद्रता का कारक बताया गया है, वहीं बिना स्नान किए तुलसी तोड़ने पर देवता उसे स्वीकार नहीं करते।

मान्यता है कि गणेश जी को तुलसी का पत्ता छोड़कर सभी पत्ते प्रिय हैं, जबकि भैरव पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। शिव जी को माघ महीने को छोड़कर कभी भी कुंद का फूल नहीं चढ़ाना चाहिए। इसी तरह केतकी का पुष्प शिव को अर्पित करना मना है, लेकिन कार्तिक महीने में विष्णु जी की पूजा में केतकी से पूजा करना शुभ माना जाता है।

पूजा के दौरान दीपक का विशेष महत्व है। शास्त्र कहते हैं कि देवताओं के सामने जलते हुए दीपक को कभी बुझाना नहीं चाहिए। दीपक से दीपक जलाने पर व्यक्ति को दरिद्रता और रोग घेर लेते हैं। दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके दीपक रखना भी अशुभ माना गया है। देवी पूजा में दीपक हमेशा बाएं और दाहिने दोनों तरफ रखने का विधान है।

तुलसी और बिल्वपत्र से जुड़े नियम भी बेहद सख्त हैं। रविवार, द्वादशी, संक्रांति, पक्षांत और संध्याकाल में तुलसी का पत्ता तोड़ना वर्जित है। मध्यान्ह के बाद भी तुलसी पत्र नहीं लेना चाहिए। कमल को पांच रात, बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके दोबारा पूजा में इस्तेमाल किया जा सकता है। बिना स्नान किए तोड़ा गया तुलसी पत्र देवता स्वीकार नहीं करते।

शालिग्राम की पूजा के अपने अलग नियम हैं। शालिग्राम का आवाहन और विसर्जन नहीं होता, साथ ही इस पर अक्षत भी नहीं चढ़ाया जाता। हालांकि लाल रंग मिला हुआ चावल चढ़ाया जा सकता है। जो मूर्ति मंदिर में स्थापित हो चुकी है, उसका भी आवाहन-विसर्जन नहीं होता। मिट्टी की मूर्ति का आवाहन-विसर्जन करके अंत में शास्त्रीय विधि से गंगा में प्रविसर्जन किया जाता है।

पूजा करते समय यदि गुरु, बड़े-बुजुर्ग या कोई पूज्य व्यक्ति आ जाए तो पूजा रोककर पहले उन्हें प्रणाम करना चाहिए और उनकी आज्ञा लेकर ही शेष कर्म पूरे करने चाहिए। हाथ में रखे फूल, तांबे के बर्तन में चंदन और चमड़े के बर्तन में गंगाजल अपवित्र हो जाता है। पूजा में पिघला हुआ घी और पतला चंदन नहीं चढ़ाना चाहिए।

वस्त्र और शुद्धता को लेकर भी नियम हैं। मलिन कपड़े पहनकर, चूहे के काटे हुए वस्त्र, बिना कटे बाल और मुंह से दुर्गंध आते हुए जप करने वाले को देवता नष्ट कर देते हैं। मिट्टी और गोबर को रात में तथा प्रदोषकाल में गोमूत्र ग्रहण नहीं करना चाहिए। मूर्ति स्नान कराते समय मूर्ति को अंगूठे से रगड़ना मना है।

लक्ष्मी पूजन के लिए पौष शुक्ल दशमी, चैत्र शुक्ल पंचमी और श्रावण पूर्णिमा को सबसे शुभ माना गया है। वहीं कृष्ण पक्ष, रिक्ता तिथि और श्रवण नक्षत्र में लक्ष्मी पूजा नहीं करनी चाहिए। दोपहर बाद, रात में, कृष्ण पक्ष, द्वादशी और अष्टमी को लक्ष्मी पूजन शुरू करना वर्जित है।

मान्यता है कि जहां अपूज्य लोगों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, वहां दुर्भिक्ष, मरण और भय का वातावरण बन जाता है। मंडप हमेशा चतुर्भुज आकार का होना चाहिए, टेढ़ा-मेढ़ा मंडप यजमान का नाश करता है। पीपल को नमस्कार हमेशा दोपहर के समय ही करना चाहिए, सुबह या शाम को नहीं।

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