सृजन शुक्ला ,जबलपुर। बरगी डैम इन दिनों केवल घटते जलस्तर की कहानी नहीं कह रहा, बल्कि वह बीते वर्षों की ऐसी यादें भी लौटा रहा है जिन्हें समय ने पानी की गहराइयों में दफना दिया था। पानी पीछे हटा तो 26 वर्ष पहले गणेश विसर्जन के दौरान डूबी एक नाव फिर लोगों की नजरों के सामने आ खड़ी हुई। उसी के साथ नर्मदा की गोद में समाए दो प्राचीन मंदिर भी फिर दिखाई देने लगे। यह दृश्य लोगों को रोमांचित जरूर कर रहा है, लेकिन इसके पीछे छिपा दर्द और प्रकृति का संदेश हर किसी को सोचने पर मजबूर कर रहा है।

बरगी डैम से सेवानिवृत्त कर्मचारी अब्दुल गनी बताते हैं कि वर्ष 2000 में गणेश विसर्जन के दौरान एक नाव डूब गई थी। उस नाव में साहू परिवार का बेटा सुशील भी सवार था। हादसे के बाद नाव कभी दिखाई नहीं दी, लेकिन इस वर्ष जलस्तर इतना नीचे पहुंच गया कि 26 साल बाद वही नाव फिर सामने आ गई। नाव को देखकर उस दर्दनाक घटना की यादें एक बार फिर ताजा हो गईं।

पानी के साथ इतिहास भी लौट आया-बरगी निवासी वीरेन्द्र जैन बताते हैं कि हरवंशपुर-बरबटी क्षेत्र में नर्मदा के भीतर समाए दो प्राचीन मंदिर भी अब जलस्तर कम होने के कारण फिर दिखाई देने लगे हैं। वर्षों तक पानी में छिपे ये मंदिर अब इतिहास की खामोश गवाही देते नजर आ रहे हैं।

क्रूज हादसे के बाद बदलते हालात पर उठे सवाल-बरगी डैम में हाल ही में हुए दर्दनाक क्रूज हादसे ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। अब जलस्तर में आई अप्रत्याशित गिरावट ने लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्र के कई लोग इसे मां नर्मदा की नाराजगी से जोड़ रहे हैं। यह स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत मान्यता है, जिसका कोई वैज्ञानिक या आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

जहां सबक लेने की जरूरत, वहां बन रही हैं रीलें-डूबी हुई नाव और प्राचीन मंदिरों को देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। कई युवक इस ऐतिहासिक और संवेदनशील स्थल पर रील और फोटोशूट बनाने में व्यस्त दिखाई देते हैं। जिस नाव से एक परिवार की दर्दनाक याद जुड़ी है, वही आज सोशल मीडिया का आकर्षण बनती जा रही है।
क्या यह सिर्फ संयोग है या प्रकृति की चेतावनी?
बरगी डैम का घटता जलस्तर केवल मौसम का असर नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलते संतुलन की ओर भी इशारा करता है। 26 साल बाद लौटे ये दृश्य हमें याद दिलाते हैं कि समय चाहे कितना भी बीत जाए, हादसों की पीड़ा और इतिहास की परछाइयाँ कभी पूरी तरह मिटती नहीं हैं। शायद यह समय नर्मदा के सम्मान, जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने का भी है।
