सृजन शुक्ला, कलम वीर। बिहार की चर्चित बांकीपुर विधानसभा सीट के चुनाव परिणामों के बाद एक दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम चर्चा का विषय बन गया है। मतगणना में जहां प्रमुख दलों के उम्मीदवारों के बीच मुकाबला रहा, वहीं ‘नीतीश कुमार’ और ‘लालू प्रसाद यादव’ नाम के दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चुनाव लड़ा। हालांकि दोनों को बेहद कम वोट मिले। उपलब्ध परिणामों के अनुसार, नीतीश कुमार नाम के निर्दलीय उम्मीदवार को 148 वोट, जबकि लालू प्रसाद यादव नाम के उम्मीदवार को 100 से भी कम वोट मिले। 
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इन दोनों हमनाम उम्मीदवारों को आखिर चुनाव मैदान में किसने उतारा?
राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। माना जा रहा है कि बड़े नेताओं के नाम से मिलते-जुलते उम्मीदवार उतारने का उद्देश्य मतदाताओं में भ्रम पैदा करना हो सकता है। हालांकि, अब तक किसी भी राजनीतिक दल या चुनाव आयोग की ओर से यह पुष्टि नहीं हुई है कि इन निर्दलीय उम्मीदवारों को किसी पार्टी ने प्रायोजित किया था या वे स्वयं चुनाव मैदान में उतरे थे। इसलिए फिलहाल किसी दल पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
भारतीय चुनावों में पहले भी कई बार बड़े नेताओं के नाम से मिलते-जुलते उम्मीदवार मैदान में उतरते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे उम्मीदवारों का उद्देश्य कई बार वोटों का बंटवारा या मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा करना होता है, हालांकि हर मामले में इसके पीछे किसी राजनीतिक साजिश के प्रमाण नहीं मिलते।
अब जांच का विषय-बांकीपुर के इस चुनाव में हमनाम उम्मीदवारों की मौजूदगी ने एक बार फिर चुनावी रणनीतियों पर बहस छेड़ दी है। यदि भविष्य में यह सामने आता है कि इन उम्मीदवारों को किसी दल या व्यक्ति ने रणनीति के तहत मैदान में उतारा था, तो मामला और अधिक राजनीतिक तूल पकड़ सकता है। फिलहाल यह सवाल बना हुआ है कि **’नीतीश कुमार’ और ‘लालू प्रसाद यादव’ नाम के इन निर्दलीय उम्मीदवारों के पीछे आखिर किसकी रणनीति थी
