मतदाता सूची पुनरीक्षण के बीच उठा बड़ा सवाल, पहचान, पात्रता और नागरिकता को लेकर देशभर में छिड़ी नई बहस
कलमवीर, डेस्क। भारतीय नागरिकता को लेकर देशभर में छिड़ी नई बहस अब चुनावी व्यवस्था तक पहुंच गई है। केंद्र सरकार द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि भारतीय पासपोर्ट अपने आप में नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं है, देशभर में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर चुनाव आयोग मतदाता सूची में नाम दर्ज करने या विशेष सत्यापन अभियान के दौरान किस दस्तावेज़ को नागरिकता का पर्याप्त आधार मानेगा।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि भारत में मतदान का अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही प्राप्त है। ऐसे में यदि आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और पासपोर्ट को अपने-आप में नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता, तो चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को लेकर आम लोगों में जिज्ञासा और भ्रम दोनों बढ़ गए हैं।
हाल के दिनों में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के दौरान भारतीय पासपोर्ट उन मान्य दस्तावेज़ों में शामिल है जिन्हें पात्रता के सत्यापन के लिए स्वीकार किया जा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पासपोर्ट को हर कानूनी स्थिति में नागरिकता का अंतिम प्रमाण घोषित कर दिया गया है, बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया के संदर्भ में यह स्वीकार्य दस्तावेज़ों में से एक है। साथ ही आयोग अन्य उपलब्ध अभिलेखों और परिस्थितियों के आधार पर भी पात्रता का परीक्षण करता है।
दूसरी ओर विदेश मंत्रालय ने हाल ही में दोहराया है कि पासपोर्ट मूलतः एक यात्रा दस्तावेज़ है और उसे अपने-आप में नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता। इसी स्पष्टीकरण के बाद यह बहस तेज हुई कि अलग-अलग सरकारी संस्थानों में दस्तावेज़ों की भूमिका अलग-अलग क्यों दिखाई देती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अधिकांश जन्मजात नागरिकों को कोई एक सार्वभौमिक “नागरिकता प्रमाणपत्र” जारी नहीं किया जाता। नागरिकता का निर्धारण परिस्थितियों के अनुसार जन्म का रिकॉर्ड, माता-पिता से संबंधित दस्तावेज़, नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों तथा अन्य उपलब्ध अभिलेखों के संयुक्त परीक्षण से किया जा सकता है। प्राकृतिककरण या पंजीकरण के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने वालों को अलग से नागरिकता प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।
निर्वाचन आयोग की वेबसाइट भी स्पष्ट करती है कि मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है। नए मतदाता के आवेदन के समय आयु, निवास और अन्य आवश्यक दस्तावेज़ों के साथ घोषणा भी ली जाती है। यदि किसी व्यक्ति की पात्रता पर संदेह उत्पन्न होता है, तो संबंधित निर्वाचन अधिकारी उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर जांच कर सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान विवाद ने एक बड़े प्रशासनिक प्रश्न को जन्म दिया है। यदि अलग-अलग सरकारी दस्तावेज़ अलग-अलग उद्देश्यों के लिए मान्य हैं, तो नागरिकता प्रमाणन की एक समान और स्पष्ट राष्ट्रीय व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है ताकि भविष्य में आम नागरिकों को किसी प्रकार की कानूनी या प्रशासनिक उलझन का सामना न करना पड़े।
इसी बीच कई राजनीतिक दलों ने भी इस विषय पर सरकार से स्पष्ट नीति की मांग की है। उनका कहना है कि जब मतदान जैसे संवैधानिक अधिकार का आधार नागरिकता है, तब नागरिकों को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि किन परिस्थितियों में कौन-सा दस्तावेज़ पर्याप्त माना जाएगा और अंतिम निर्णय किन कानूनी प्रावधानों के आधार पर लिया जाएगा।
फिलहाल कानूनी स्थिति यही है कि चुनाव आयोग मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित प्रक्रिया और स्वीकार्य दस्तावेज़ों के आधार पर पात्रता का परीक्षण करता है, जबकि नागरिकता का अंतिम प्रश्न परिस्थितियों, उपलब्ध अभिलेखों और लागू कानूनों के अनुसार तय किया जाता है। इसी कारण देश में अब एक व्यापक और स्पष्ट नागरिकता प्रमाण व्यवस्था की मांग पहले से अधिक मुखर होती दिखाई दे रही है।
