त्योहार हो या वीआईपी मूवमेंट… आखिर कब तक बाहरी फोर्स के भरोसे चलेगी जिले की खाकी? 539 पद रिक्त, 3,803 स्वीकृत बल के मुकाबले सिर्फ 3,265 जवान तैनात; बढ़ते अपराध और बढ़ती आबादी के बीच कानून-व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

Srajan Shukla
Srajan Shukla 108 Views
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सृजन शुक्ला, जबलपुर। देशभक्ति और जनसेवा का संकल्प लेकर आम नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली जबलपुर पुलिस इन दिनों खुद गंभीर स्टाफ संकट से जूझ रही है। जिले में पुलिस बल की भारी कमी कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कागजों पर व्यवस्था मजबूत दिखाई देती है, लेकिन हकीकत यह है कि स्वीकृत 3,803 पदों के मुकाबले केवल 3,265 पुलिसकर्मी ही तैनात हैं, जबकि 539 पद आज भी रिक्त पड़े हैं।

स्थिति यह है कि सामान्य दिनों में किसी तरह व्यवस्था संभाल ली जाती है, लेकिन जैसे ही होली, दिवाली, ईद, मुहर्रम जैसे बड़े त्योहार आते हैं या किसी वीआईपी अथवा वीवीआईपी का दौरा होता है, जिले की पुलिस के सामने बल की कमी साफ नजर आने लगती है। ऐसे अवसरों पर सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर बार पड़ोसी जिलों और विशेष पुलिस कंपनियों से अतिरिक्त बल मंगाना मजबूरी बन जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बढ़ती आबादी, बदलते अपराधों के स्वरूप और लगातार बढ़ती जिम्मेदारियों के बावजूद जबलपुर पुलिस कब तक बाहरी फोर्स के सहारे कानून-व्यवस्था संभालती रहेगी?

अपराध बढ़े, लेकिन पुलिस बल नहीं-संस्कारधानी में अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। छोटी-छोटी बातों पर हत्या, चाकूबाजी, लूट, चोरी और महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार सामने आ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर शहर की यातायात व्यवस्था भी बदहाल है। दिनभर लगने वाले जाम और बढ़ते ट्रैफिक दबाव के बीच सीमित पुलिस बल पर जिम्मेदारियों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

सुरक्षा व्यवस्था के लिए हर बार फैलानी पड़ती है झोली-जिले में कोई बड़ा धार्मिक आयोजन हो, त्योहार हो या किसी बड़े नेता अथवा संवैधानिक पदाधिकारी का आगमन—हर बार अतिरिक्त पुलिस बल के लिए मुख्यालय को दूसरे जिलों की ओर देखना पड़ता है। बाहर से आने वाले जवान स्थानीय संवेदनशील क्षेत्रों, गलियों और अपराधियों की गतिविधियों से पूरी तरह परिचित नहीं होते, जिससे सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका बनी रहती है।

रिक्त पदों का सबसे ज्यादा असर थानों पर-स्टाफ की कमी का सबसे बड़ा खामियाजा थानों में तैनात पुलिसकर्मियों को भुगतना पड़ रहा है। लगातार लंबी ड्यूटी, छुट्टियों का अभाव और बढ़ते कार्यभार के कारण जवानों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।

दूसरी ओर विवेचकों की कमी से थानों में दर्ज मामलों की जांच लंबित होती जा रही है। कई जांच अधिकारियों के पास दर्जनों प्रकरण लंबित हैं, जिसके कारण पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा। रात की गश्त और अपराध नियंत्रण जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं, जिससे बदमाशों के हौसले बुलंद हैं।

राष्ट्रपति दौरे से लेकर मुहर्रम तक मंगानी पड़ी बाहरी फोर्स-हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के जबलपुर प्रवास के दौरान सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए लगभग 1,800 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती दूसरे जिलों से करनी पड़ी थी। वहीं मुहर्रम के अवसर पर भी लगभग 200 अतिरिक्त जवान बुलाए गए थे। यह स्थिति बताती है कि बड़े आयोजनों के दौरान जिला पुलिस अकेले सुरक्षा व्यवस्था संभालने में सक्षम नहीं है।सृजन शुक्ला, जबलपुर। देशभक्ति और जनसेवा का संकल्प लेकर आम नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली जबलपुर पुलिस इन दिनों खुद गंभीर स्टाफ संकट से जूझ रही है। जिले में पुलिस बल की भारी कमी कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कागजों पर व्यवस्था मजबूत दिखाई देती है, लेकिन हकीकत यह है कि स्वीकृत 3,803 पदों के मुकाबले केवल 3,265 पुलिसकर्मी ही तैनात हैं, जबकि 539 पद आज भी रिक्त पड़े हैं।

पदवार स्थिति:

बढ़ती चुनौतियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पुलिस बल के सैकड़ों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं, तब आखिर नागरिकों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने के लिए इन पदों पर भर्ती कब होगी?

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